लफ्जों  के  लिबास  नहीं  होते ! Words are Naked !

जो  बातें  कभी  जाहिर  नहीं  होती

खामोशियाँ  जिक्र  कर  जाती  हैं

लिहाज  का  क्या  कहें

लफ्जों  के  लिबास  नहीं  होते

काफिले  चलते  रहते  हैं

कारवां  जाता  है  गुजर 

क्या  खोया  क्या  पाया

रिश्तों  में  हिसाब   नहीं  होते

परछाइयां  धुँधली  हैं

पर  खोया  चेहरा  ढूँढ़ते  रहते  हैं

आईने  पे  सायों  की  जमी  हैं  परतें 

अधूरे  ख्वाब  कभी  पूरे  नहीं  होते

हवाएं  न  जाने  कहाँ  उड़ा  ले  जाती  हैं

परिंदे  परेशां  नहीं  होते

ऊंचे  आकाश  में  छुपी  है  समंदर  की  गहराई 

ख्यालों  के  कभी  दायरे  नहीं  होते

बनावटी  बातें  जो  हैं …उनसे

कभी  कभी  नमी  का  अंदेशा  तो  होता  है

पर  लफ्जों  की  धोकेबाज़ी  से

दिलों  के  रेगिस्तान  हरे  नहीं  होते

बेगानों  में  अपनों  को  खोजते  हैं

और  दूरियों  में  नजदीकियां

दहलीज  पे  खड़ी  ज़िन्दगी देती  है दस्तक    

धड़कनों  के  दरमियाँ  फासले  नहीं  होते

ख्वाइशों की हसरतों  से  हैरत  क्यूँ ,

फितरत  को  जब  हरकतों  से  फुर्सत  नहीं

उधार  की  ज़िन्दगी  से  नाराज  क्यूँ 

हमराज  अक्सर  हमसफ़र  नहीं  होते

क्या  इंसानियत  के  चर्चे 

क्या  हैवानियत  के  किस्से

शख़्शियत   के  कई  अंदाज  हैं  ये 

हासियों  में  बंटी   ज़िन्दगी  के  मायने  नहीं  होते

Pic : Amanda APS

आओ कभी… मेरी खिड़की में बैठो…Come Sometime… Sit in My Window

आओ  कभी … मेरी  खिड़की  में  बैठो…

कुछ  गाओ , कुछ  गुनगुनाओ

कुछ  हंसो , कुछ  मुस्कुराओ

कुछ  खिलखिलाओ , कुछ  फुसफुसाओ ;

और  आओ …

करें  कुछ  चुगलियां , कहें  कुछ  चुटकुले

करें  कुछ  कानाफूसी , लगाएं  कुछ  कहकहे

करें  कुछ  गपसप , और  कुछ  गिले शिकवे

कहें  कुछ  किस्से  सुने  सुनाये , कुछ  अनकहे ;

आओ  कभी  अलसाई  लसलसी सी  दोपहरी  में …

मेरी  गरम  अदरखि  चाय  के  घूंटो  में 

करवट  बदलती  खूबसूरत  कहानियों  की

चुनिंदा  चर्चरी  चुस्कियां  हैं ;

आओ  कभी  शबनमी  धुँधली  सी  शाम  ढले …

मेरी  पुरानी  रक्तिम  शराब  के  प्यालों  में 

सलवटें  और  खुमारियों  भरे

दबे -पावं  रिश्तों  के  नशीले  लम्हे  हैं ;

आओ  कभी  फटे  पन्नों  वाली  पुरानी  किताब  में …

ढूंढे  अपने  आप  को , या  फिर  खो  जाएँ ,

और  उसकी  लज़ीज़  लिपटवां  खुसबू  में

लपेट  लें  वो  अरमान  अर्सों  पुराने ;

आओ  सुलझा  लें  मांझे  को , जिसमे  उलझी  है …

पतंगो  सी  उमंगें  और  ख्वाहिशें ,

अतीत  की  मुंडेर  पे  बैठ  दो  पल …

आओ  करें  कुछ  ऎसी  बातें  मुलाकातें ;

आओ  कभी ऐ जिंदगी , के  एक  मुद्दत  हुई ,

आओ  के  सहला  जाओ , तुम  मुझे  बहला  जाओ ,

झरोके  मेरे  खुले  हैं , अपने  खोल  दो ,

झांको , मत  झिझको , मत  जाओ , रुक जाओ , रह  जाओ .

आओ  कभी … मेरी  खिड़की  में  बैठो …

कुछ  कहो …

या फिर कहने दो खामोशियों को…

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